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Showing posts from July, 2024

आवाज कि दुनिया के दोस्तों (३)

            सायगल साहब के गानों के बारे में बात करना चाहें तो बातें कभी खत्म नहीं होगी ! उनके गाये हुवे सारे के सारे गाने नायाब नगीनों जैसे हैं. चाहे वे पंकज मल्लिक , तिमिर बरन , आर. सी. बोराल या   नौशाद के निर्देशन में गाए फिल्मी गीत हों या रवीन्द्र संगीत , ग़ज़ल , दादरा, ठुमरी या भजन.   बस सुनते ही रहिए! चंडीदास, धरती माता, दुश्मन जैसी सफलतम फिल्मों के बाद सायगल साहब के अभिनय और संगीत का सूर्य चारों और चमकने लगा.  धन की वर्षा होने लगी, फिर भी जन्मजात ईन्सानियत, आम जनता के प्रति समानत्व तथा अनुकंपा कभी कम न हुवे. दुर्गा पूजा के वक्त कुछ मोहल्लों में पैसे की कमी की वजह वे किसी कलाकार को बुला नहीं पाते. ऐसा ही कोई पंडाल खाली दिखे, तो सायगल साहब गाडी से उतर कर, हार्मोनियम मांग कर रवींद्र संगीत या अपनी ही बांग्ला फिल्म के लोकप्रिय गाने छेड देते थे. लोग ईकठ्ठा हो कर प्यार से सूनते थे. अंत में वे  माँ दुर्गा की प्रतिमा को नमस्कार कर वहां से चले जाते.  *** सायगल साहब की जीवनकथा की फिल्म का एक प्रसंग और भी हृदयद्रावक है. जालंधर ...

आवाज कि दुनिया के दोस्तों (2)

   वर्ष 1957-58 में सायगल साहब की जीवनी पर ‘सायगल की अमर कहानी ’ फिल्म बनी. ईस में बतायी गयी सहगल साहब की जीवन यात्रा केवल संगीत का समारोह न रह कर एक पवित्र जलधारा समान जीवन कथा बन गयी.  ईस के बहाव में बहते हुवे सारे प्रेक्षकोंने सायगल साहब की मानवता और करुणा की शीतलता के अनुभव एक संगीतमय झंकार के साथ सूने, और बहते चले गये. चित्रपट के आखिरी दृश्य के बाद थियेटर की सारी बत्तियाँ प्रकाशित हुवीं तब भी सब बैठे ही रहे. नम आँखो से निकले अश्क जब गाल पर रूके तब प्रेक्षकों को एहसास हुआ कि फ़िल्म ख़त्म हो गई है. इस फिल्म के कई दृश्यो में कुछ उन की फिल्मोंसे लिये गये ‘क्लिप्स' थे, तो कुछ उन के जीवनसे जूडे हुवे किस्से, जो अविस्मरणीय बन गये. पहला प्रसंग जो हम सब के दिल में बस गया, वह उस वक्त का था जब सहगल साहब अपना वतन जालंधर छोड कर कोलकाता नौकरी ढूंढने गये थे. उन्हें पहला काम मिला था बडी हवेलियों में जा कर साडियाँ बेचना. उस जमाने में ‘बडे घर’ की गृहिणीयाँ खरिदारी के लिये ‘शापिंग’ के लिये बाहर नहीं जाया करती थीं. कुंदन लाल सहगल एक मजदूर के सिर पर कपड़े की एक बड़ी गठरी रखवा कर , कोलका...

आवाज की दुनिया के दोस्तों (1)

  1930 के दशक में गुजरात के एक उजडे से कस्बे के छोटे से गाँव में हम लोग रहते थे. पिताजी सरकार के वरिष्ठ अफसर होने के अलावा  भारतीय शास्त्रीय संगीत के साधक भी थे. शाम के वक्त अपने ईसराज पर रियाज तो कभी मुंबई से डाक से मंगायी गई ग्रामोफोन रिकार्ड्झ चाभी वाले HMV के ग्रामोफोन पर सूनते थे. ऊनके साथी अफसरों की ऋची देख कर राग पर आधारित फिल्म के गानों की रिकार्डझ भी मंगवाते थे और सब मिल कर सूनते थे.      एक दिन डाक से आया पार्सल खोल कर उसमें से निकाली गयी रिकार्ड वे बजाते थे. मैं, पिताजी का सबसे छोटा बेटा खेल कर घर में प्रवेश ही कर रहा था, कि मेरे कानोंने यह शब्द सूने : “सूनो सूनो हे किशन काला                   आयी तुम्हरे द्वार, सूनो मेरी पूकार. .. दरवाजे में खड़ा वह छह वर्षीय बालक ईस रिकार्ड से प्रकट होती हुवी दिव्य वाणी सून कर मंत्रमुग्ध हो गया. बंगाली ढोलक – खोल - की अंतिम थिरक पर गाना कब खतम हुवा, पता ही न चला. अचानक पिताजी का ध्यान बेटे की ओर गया , उसने उसे बुलाया और कहा , “ आओ,...

तुम्हारा ईन्तजार है...

       किशोर अवस्था से यौवन में प्रवेश होते ही जब किसी की मधुर मुस्कान अपने मानस में जैसे कायमी तौर पर अंकित होती है, वैसे ही कुछ गाने अपने जहेन में हमेशा के लिये ध्वनि मुद्रित हो जाते हैं. कुछ गाने ऐसे भी होते हैं, जिन के अदृश्य तार किसी प्रसंग से जूड जाते हैं. जब कोई विशिष्टt शब्द, कोयल की कुहू या बारिश की एक फुहार अपने तन, मन या हृदय के तार को छू लेते हैं, बस, वह दिन, वह पल और वह व्यक्ति अपने अंतर्मन के चक्षु के सामने उभर आते हैं! विलियम वर्डझवर्थने जिसे अपने अंदाज में लिखा - They flash before our inward eye !    उस पल की याद में जब अपना प्रियजन नजर के सामने अदृष्ट रूप से ही क्यों नहीं, दिखने लगते है तब होठों के कोने एक हलके से स्मित में  खिल जाते हैं. उस वक्त अगर कोई हमें देख ले और पूछे, "क्यों जी, किस की याद में खोये खोये ऐसी मिठी मुस्कान आप के गालों पर फूट रही है?"     हम क्या जवाब दें?       उन्हें कैसे समजायें कि यह गाना मुझे मेरे जीवन के उन खोये हुवे पल की याद दिला रहे है जब वे हम से पहली बार मिले थे और ठीक स...