आवाज की दुनिया के दोस्तों (1)
1930 के दशक में गुजरात के एक उजडे से कस्बे के छोटे से गाँव में हम लोग रहते थे. पिताजी सरकार के वरिष्ठ अफसर होने के अलावा भारतीय शास्त्रीय संगीत के साधक भी थे. शाम के वक्त अपने ईसराज पर रियाज तो कभी मुंबई से डाक से मंगायी गई ग्रामोफोन रिकार्ड्झ चाभी वाले HMV के ग्रामोफोन पर सूनते थे. ऊनके साथी अफसरों की ऋची देख कर राग पर आधारित फिल्म के गानों की रिकार्डझ भी मंगवाते थे और सब मिल कर सूनते थे. एक दिन डाक से आया पार्सल खोल कर उसमें से निकाली गयी रिकार्ड वे बजाते थे. मैं, पिताजी का सबसे छोटा बेटा खेल कर घर में प्रवेश ही कर रहा था, कि मेरे कानोंने यह शब्द सूने :
आयी तुम्हरे द्वार, सूनो मेरी पूकार...
दरवाजे में खड़ा वह छह वर्षीय बालक ईस रिकार्ड से प्रकट होती हुवी दिव्य वाणी सून कर मंत्रमुग्ध हो गया. बंगाली ढोलक – खोल - की अंतिम थिरक पर गाना कब खतम हुवा, पता ही न चला.
अचानक पिताजी का ध्यान बेटे की ओर गया, उसने उसे बुलाया और कहा, “आओ, बेटा. लगता है तुम्हें गाना अच्छा लगा, है ना? फिर से सुनोगे?”
मैंने सिर हिला कर हां कर दी. पिताजीने ग्रामोफोन की स्प्रिंग को चाभी से घूमाया और फिर से रिकॉर्ड बजाना शुरू किया. गाना खत्म होने पर उन्हों ने पूछा,”और गाने सूनोगे?”
मैंने तुरन्त हां भर दी. उन्होंने एक और रिकार्ड चूनी और बजाना शुरू किया. गीत था –
“बालम आये बसो मेरे मन में/सावन आया, तुम ना आये...”
गीत का मुखडा समाप्त होने पर उन्होंने कहा, “अब ईस गाने के अंतरा पर ध्यान केंद्रित करो. ईस गाने में एक सुंदर बदलाव देख पाओगे.“
और अंतरा शुरू हुवा : "सुरतिया जाकी मतवारी/पतरी कमरिया उमरिया बाली..." और उत्साह से जैसे धडकनें तेज होती हैं, वैसे गाने की पंक्तियां भी तेजी से बढने लगी.
गाना ख़त्म होने के बाद पिताजीने अपने ईसराज को कपडे के खोल से बाहर निकाला, और कहा, "अब मैं तुम्हें ये गाना समझाता हूँ!" कह कर इसी गाने की धुन ईसराज पर बजाई. बीच-बीच में रुककर मुझे गाने की बारिकियां समजाय़ीं. अंतरे की व्याख्या करते हुए कहा, "गाने के आरंभ में जो गायक जिस गति से गाते थे, ऊस में वे स्वरों की शुद्धता तथा उसका जैसे विशेष बयान करते हैं वैसे गाते हैं. ईसे विलंबित कहते हैं. जब गायक अंतरा शुरू करते हैं, तब अपना सूरों पर जो प्रभूत्व है उसे तेज गति से गा कर सूनाते है. ईसे द्रूत कहते है. यह गहरा विषय है. तुम जब बडे हो जाओगे, हम तुम्हें विस्तार से सिखायेंगे. फिलहाल तुम्हारी समज में आये वैसे बता रहे हैं. ईस गाने के गायक है के. एल. सायगल. जब यह सिनेमा दिखायेंगे तब तुम्हें पता चलेगा, सायगल साहबने गाना ईस तरह गाया है, जैसे वे खुद देवदास हैं, सायगल नहीं.
उस वक्त पिताजी की बातें - विलंबित या द्रूत क्या है, मेरे समझ में नहीं आईं, लेकिन मेरी बाल सुलभ बुद्धि को यह समझ आया कि ईस गाने में दो विभाग थे. पहले मंद गति से गाया हुवा और दुसरा विभाग ऐसा था जिस में गाने की लय तेज हुवी थी, और भावप्रदर्शन में भी बदलाव थे, जो कि मेरी समज में आये. जो भी सूना, बहुत अच्छा लगा. और पिताजी को वही कहा!
पिताजी भी गाने सूनने – सूनाने के मूड में थे. उन्हों ने पार्सल से दूसरा रिकर्ड निकाला और बजाना शुरू किया. यह गाना तो हमें बहुत ही प्यारा लगा. शुरू से ही द्रूत गति से, और ऐसे लगा, जब कोई आनंद की पराकाष्ठा महसूस करता है तब मन में जो भावनायें उछलती हैं, उसे गायक गीत द्वारा ईसी तरह प्रस्तुत कर रहा है. गाना था -
"मैं क्या जानूं, क्या जादू है..."
इस बार जब सहगल साहब ने "मैं क्या जानू क्या" के बाद जो तान छेड़ी तो ऐसा लगा मानो वह तान नहीं, सागर की एक ऐसी लहर है, जिस पर सवार हो कर मैं खुशी के पहाड के शिखर को छू रहा हुं. गाने की पंक्तियां - “मन पूछ रहा है अब मुझसे/ नैनों कहा है क्या तुझ से?” तो गायक का उल्लास मेरे मन में ऐसे छा गया, जो आज भी ईस पंक्ति को सूनने पर अनुभव कर सकता हुं !
आज जब मैं इन गीतों के बारे में सोचता हूं तो ऐसा लगता है कि परमात्माने गीत, संगीत और सहगल साहब की आवाज को मिला कर निसर्ग का एक अनूठा व भव्य त्रिवेणी संगम बना दिया था!
***
जैसे आयु बढने लगी, सिने संगीत के बारे में कुछ कुछ समझ आने लगी. हमारे उस विरान से गांव के नजदिक छोटा शहर था. वहां छोटा सा सिनेमागृह था जहां कभी कभार न्यु थिएटर्स के चलचित्र प्रदर्शित होते थे. उस वक्त पिताजी हमें सहगल साहब की 'देवदास', 'दुश्मन' जैसी फिल्में दिखाने ले जाते थे. तब से सहगल साहब की आवाज और अभिनय पर स्नेह और आदर हुवा. अगर मैं बाहर खेल रहा होता था और पिताजीने ग्रामोफोन पर लगायी हुवी रिकार्ड पर सायगल साहब का कोई भी गाना सूनाई पडता था, तो मैं खेल छोड़कर गाना सुनने दौड कर घर चला जाया करता था ! जैसे की
"झूलना झुलाये, अम्बुवा की डारी पे, कोयल बोले.."
***
मेरे पिताजी का देहांत हुवा तब मेरी आयु नौ वर्ष की थी. उनके पश्चात् मेरे बारह साल कैसे बिते यह महत्वपूर्ण नहीं है. मगर मुझे वह दिन अभी तक याद है जब अस्पतालमें बाबूजी से मेरी आखिरी मुलाकात हुवी थी. स्ट्रोक के कारण वे वाचा खो चूके थे. मुझे देखकर उनके चेहरे पर छायी खुशी, साथ ही अपना अंत समय आया था उस के अहेसास से उनकी आंखों में फैली हुवी उदासी, मुझे कुछ भी कह सकने की असमर्थता की बेबसी और आंसू – सब सहगल साहब के इस गाने को बयां करते दिखे -
मुलाकात के दुसरे दिन वे चल बसे. ना वो दिन भूल पाया, ना सहगल साहब का वह गाना.. दोनों एक उस प्रसंग से जूड गये. हमेशा के लिए.
(क्रमश:)
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