तुम्हारा ईन्तजार है...
किशोर अवस्था से यौवन में प्रवेश होते ही जब किसी की मधुर मुस्कान अपने मानस में जैसे कायमी तौर पर अंकित होती है, वैसे ही कुछ गाने अपने जहेन में हमेशा के लिये ध्वनि मुद्रित हो जाते हैं. कुछ गाने ऐसे भी होते हैं, जिन के अदृश्य तार किसी प्रसंग से जूड जाते हैं. जब कोई विशिष्टt शब्द, कोयल की कुहू या बारिश की एक फुहार अपने तन, मन या हृदय के तार को छू लेते हैं, बस, वह दिन, वह पल और वह व्यक्ति अपने अंतर्मन के चक्षु के सामने उभर आते हैं! विलियम वर्डझवर्थने जिसे अपने अंदाज में लिखा - They flash before our inward eye ! उस पल की याद में जब अपना प्रियजन नजर के सामने अदृष्ट रूप से ही क्यों नहीं, दिखने लगते है तब होठों के कोने एक हलके से स्मित में खिल जाते हैं. उस वक्त अगर कोई हमें देख ले और पूछे, "क्यों जी, किस की याद में खोये खोये ऐसी मिठी मुस्कान आप के गालों पर फूट रही है?"
हम क्या जवाब दें?
उन्हें कैसे समजायें कि यह गाना मुझे मेरे जीवन के उन खोये हुवे पल की याद दिला रहे है जब वे हम से पहली बार मिले थे और ठीक से प्रेम का ईजहार भी नहीं कर पाये थे? या फिर उन्हें छोड कर जाने का वक्त आ गया था, और हमें उन से यह कहना पड रहा था कि कल सुवह होने से पहले हमें यहां से जाने की तैयारी करनी होगी ?
बस, ईसी पल को हेमंत कुमारने अपने शुरू के एक गीत में जिवंत किया था - आंचल से क्युं बांध लिया मुझ परदेसी का प्यार! !
क्या वे दिन थे, और क्या वे गीत, गायक और उन्हें बार बार सूनने का लुत्फ!
हेमंत कुमार की यही तो खूबी थी! जो भी गीत गाते थे, उस में वे ऐसे जूड जाते थे जैसे वे कवि की संजीदगी खुद महेसूस कर उन्हें अपने गीत द्वारा अभिव्यक्ति देते थे. शायद यह उनकी रवींद्र संगीत की शिक्षा थी. कवि किसे, किस उद्देश्यसे क्या कहना चाहते हैं जो शब्दों से भी परे है. ईन्हीं भावनाओं को समज कर, उसी के बहाव में बहते बहते हेमंत कुमार अपनी नजम, गीत या गजल पेश करते थे. जैसे उन्होंने 'प्यासा' में गजल गायी थी, जहां शायर सिर्फ आत्म निवेदन कर रहा है -
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कई बार ऐसे भी मौके आते हैं जब संगीत निर्देशक अपनी बनायी हुवी धुन को फिल्म में खुद गाना पडता है. यह पेशकश संगीत निर्देशक के लिये बहुत मुश्कील होती क्युं कि गाने के साथ ऑर्केस्ट्रा के लिये baton भी खुद को ही चलाना जरूरी होता है, जिस से गीत की पंक्तियों के बिच का interlude, ताल और खास साज की झंकार ठीक वक्त पर बजे. ईस की प्रतिति हेमंत कुमार के गाये 'खामोशी' के गीत में किस तरह होती है, यह बगैर सूने पता न चलेगा ! और तो और, जिस नजाकत से उन्होंने गीत की अंतिम पंक्तियाँ - "मुक्तसर सी बात है, तुम से प्यार है..." गायीं, श्रोता के मुख से 'वाह!' अनायास निकल आता है !
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भारतीय सिनेसृष्टि में कलाकारों के भाग्य जिस तरह यकायक खुल जाते हैं, वैसे ही अस्त भी हो जाते हैं. हेमंत कुमार के जीवन में भी ऐसा ही वक्त आया जब उन्हों ने खुद की लागत से बनायी हुवीं फिल्में बाक्स आफिस पर निष्फल हुवीं. सारी पूंजी वे खो बैठे थे. तकरिबन उसी समय राहुल देव बर्मन, बप्पी लाहिरी जैसे नये Pop Culture के संगीत निर्देशक अति लोकप्रिय हो गये थे ईस वजह उन्हें काम मिलना बंद हो गया था. आर्थिक परिस्थिति बहुत मुश्कील हो चली थी. गुजरात के सुरत शहर के एक सामाजिक कार्यकर्तो ने लिखा था कि उन के छोटे से ईदारे के fund raising के लिये हेमंत कुमार को आमंत्रित करने वे गये. उन्हों ने कहा उन के पास केवल पांच हजार रूपये का बजट था. उन के लिये फर्स्ट क्लास का टिकट भी दे सकते थे, मगर ईस के अलावा ऊन के पास पैसे नहीं थे. हेमंत कुमार तुरंत तैयार हो गये. वे अपना हार्मोनियम ले कर पहुंच गये थे और तकरिबन चार घण़्टे उन्होंने अपने गीत पेश किये थे.
ऐसी परिस्थिति में उन्हें मंगेशकर परिवार से काफी मदद मिली. पंडित हृदयनाथ मंगेशकरने उन्हें पूरी फीस दे कर कार्यक्रम पेश किये. ईतना ही नहीं, लताजी के साथ महाराष्ट्र के मछुआरों का समुद्र गीत रिकार्ड किया जो बेहद लोकप्रिय हुवा. ईस गीत में उन्होंने जिस कदर मराठी शब्दों के उच्चार सुचारू रूप से पेश किये, वाकई उमदा रहे. एक बंगाली भद्र लोग के लिये यह कठिन काम हेमंत कुमारने बखूबी निभाया. और गाया भी कैसे ! जब ईस गाने के एक अंतरा पर वे गाते हैं "या गो दर्या चा दर्या चा दरारा मोठा..तवा पान्या मंदी ऊठतात डोंगर लाटा.." सूनने वाला महसूस करता है ईस मछुआरे की नौका के सामने पहाड सी विशाल मौजें सिंह-गर्जना करते हुवे आ रहीं हैं. ईस का अनुभव आप को तब होगा जब आप यह गीत सूनिएगा. :
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