आवाज कि दुनिया के दोस्तों (2)

 

 वर्ष 1957-58 में सायगल साहब की जीवनी पर ‘सायगल की अमर कहानी फिल्म बनी. ईस में बतायी गयी सहगल साहब की जीवन यात्रा केवल संगीत का समारोह न रह कर एक पवित्र जलधारा समान जीवन कथा बन गयी.  ईस के बहाव में बहते हुवे सारे प्रेक्षकोंने सायगल साहब की मानवता और करुणा की शीतलता के अनुभव एक संगीतमय झंकार के साथ सूने, और बहते चले गये. चित्रपट के आखिरी दृश्य के बाद थियेटर की सारी बत्तियाँ प्रकाशित हुवीं तब भी सब बैठे ही रहे. नम आँखो से निकले अश्क जब गाल पर रूके तब प्रेक्षकों को एहसास हुआ कि फ़िल्म ख़त्म हो गई है.

इस फिल्म के कई दृश्यो में कुछ उन की फिल्मोंसे लिये गये ‘क्लिप्स' थे, तो कुछ उन के जीवनसे जूडे हुवे किस्से, जो अविस्मरणीय बन गये.

पहला प्रसंग जो हम सब के दिल में बस गया, वह उस वक्त का था जब सहगल साहब अपना वतन जालंधर छोड कर कोलकाता नौकरी ढूंढने गये थे. उन्हें पहला काम मिला था बडी हवेलियों में जा कर साडियाँ बेचना. उस जमाने में ‘बडे घर’ की गृहिणीयाँ खरिदारी के लिये ‘शापिंग’ के लिये बाहर नहीं जाया करती थीं. कुंदन लाल सहगल एक मजदूर के सिर पर कपड़े की एक बड़ी गठरी रखवा कर, कोलकाता की धनी व्यक्तियों की हवेलीयों में  जा कर साडीयां और महंगा कपडा बेचने जाते थे.

एक दिन ऐसे ही वे एक अमीर गृहिणी को साड़ियाँ दिखा रहे थे. इस महिला के पीछे उसकी दासी और दासी की छोटी सी बेटी खड़े थे. ढेर सारी साडियां देखते देखते ईस नन्ही किशोरी को एक बनारसी साड़ी इतनी पसंद आयी, कि वह बोल पडी, मा, कितनी सुंदर साड़ी है यह! मुझे बहुत अच्छी लगी. मेरे लिय़े ले लो ना !

ऐ कलमूंही, ईस साडी की किमत का अंदाजा भी है तुझे? तेरी माँ पूरी जिंदगी मेरी चाकरी करेगी तब भी ईसे खरीद न पाएगी, समजी? अपनी औकात में रह और चल, निकल यहां से,” मालकिन चिल्लाई. 

उस लडकी की आंखों से आंसू उभर आये. भयभीत हो कर अपनी मां को लिपट गयी.

सायगल साहब से उस मासुम लड़की का करूण, अपमानित, चेहरा देखा न गया. ना ही सहा गया उस सेठानी का अहंकार. उसी क्षण उन्होंनें सेठानी से कहा, "ईस लड़की की औकात की बात छोडिये, लेकिन आप का बर्ताव ईतनी उमदा साड़ी पहनने योग्य नहीं हैं,” कह कर उन्होंने वह बेशकिमती साडी नौकरानी की बेटी को उपहार में दी, मजदूर से गठरी उठवाई और वापस दुकान चले गये. वहां पहुंच कर सेठजी से कहा, ''एक साड़ी कम है. उसके पैसे मेरी तनख्वाह से काट लिजीएगा.''

 

***

 

समय बदल रहा था. सहगल साहब ने संगीत की दुनिया में तब कदम रखा जब एक निर्माता ने उनका शास्त्रीय संगीत पर आधारित गाना सुना. उन दिनों में कोलकाता के सिनेजगत में नायक में तीन चीजें महत्वपूर्ण मानी जाती थीं : रूप, अभिनय और गायनकला.  यदि कोई कलाकार गायन तथा अभिनय में अच्छे हैं, पर रूप नहीं तब भी वे पसंद किये जाते थे. जैसे की पहाड़ी सान्याल, के.सी. डे, पंकज कुमार मल्लिक.

बस, खरज के स्वर में शुद्ध सूर तथा शब्दों का स्वच्छ उच्चारण सुनते ही स्टुडियो के मालिक सायगल साहब की आवाज के चहेते बन गये. तुरन्त ही उन्होंने अपनी फिल्मों के करारनामे पर उन से दस्तखत करवा लिये.

सायगल साहब की शुरुआती फिल्में बहुत ही असफल रहीं. पहले तो उन का पूरा नाम - कुंदन लाल सहगल  - जो कि पूर्णतया अ-बंगाली था, प्रेक्षक गण के पल्ले न पडा. वे आदि हो चूके थे पहाडी सन्याल, प्रमथेश बरुआ, उमा शशी, कृष्ण चंद्र डे (के.सी. डे) जैसे बंगाली नाम के कलाकारो के. यह जैसे कम था, उन्हें शुरू की फिल्मो में काम मिला उन के  नाम - 'जिंदा लाश' और ऐसे ही थे! बाक्स आफीस में उन की फिल्में बिलकुल ‘फ्लाप’ हुवीं.

एक आखिरी मौके के तौर पर न्यु थियेटर्सने संगीत-प्रधान फिल्म ‘चंडीदास’ बनायी. उनका नाम भी बदला गया और वे सहगल से ‘सायगल’ बन गये. 

जैसे ही ‘चंडीदास' रूपहले पर्दे पर प्रदर्शित हुवी, भारत के फिल्म और फिल्मी संगीत विश्वमें क्रांति सी छा गई! चारों और ‘सायगल’ नाम गुंजने लगा. उमा शशि के साथ गाया हुवा उनका गीत “प्रेमनगर में बसाऊंगी घर में, त्यज के सब संसार...' लोगों को बहुत पसंद आया. लेकिन जब चंडीदास का भगवान श्री कृष्ण को आर्जवतापूर्ण आवाहन करता हुवा भजन "सुनो सुनो हे कृष्ण काला" सायगल साहब के कण्ठ से निकला, सृष्टि पर मानो आनंदमय ऊर्जा का एक परमाणु विस्फोट सा हो गया! ईस भजन का 'रेडिएशन' आज भी लोगों के दिलों में भक्ति का कंपन निर्माण करता है ! बंगाल के प्रसिद्ध भटियाली लोकगीत की परंपरा में 'खोल' (बंगाली ढोलक) के ताल पर गाया हुवा यह किर्तन भक्ति संगीत के क्षेत्रमें अद्भुत रत्न-सा बन गया. आज भी कोई ईसे सुनता है, ऐसा लगता है जैसे चंडीदास की आत्मा कृष्ण भक्ति के रस में डूब कर सायगल साहब की आवाज में समा गई और भक्ति खुद भजन गाने लगी है !

ईस भजन से भारतीय सिनेमा में एक अलौकिक प्रकाशमय सूर्य सा कलाकार प्रकट हुवा जिसकी गीत-किरणें भारत भूमि पर बरसती रहीं! चंडीदास के बाद कोलकाता से पूरे देश में ईस किर्तन के साथ साथ उमा शशी के साथ गाये हुवे फिल्म ‘धरती माता’ के गीत बहुत ही लोकप्रिय हुवे. ईन गीतो में सायगल साहब के आवाज की गहेराई के साथ  कवि के गहने समान उन के लिखे शब्द, जिन्हें सायगल साहब खालिस तलफ्फूज से प्रकाशमय करते थे, उसकी बराबरी कोई न कर सका. ईसी 'धरती माता' का उमा शशीजी के साथ गाया हुवा यह गीत सुनिये. रिकार्डिंग बहुत पुरानी है, कुछ मंद-सी लगे, पर चमत्कार होता है जब सायगल साहब गाते हैं "मीठा गीत बनुं झरने का..."


‘मन की बात बताउं/क्या क्या बात उठत मोरे मन में...’


ऐसे ही एक गाना -  'दुनिया रंग रंगिली' उन्होंने उमा शशी और के.सी. डे के साथ गाया है. 

                                                        

                                                                            (क्रमश:)

  

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