जाने कहां गये वो दिन

     अलौकिक आवाज के स्वामी सायगल साहब फिल्म जगत को अल विदा कह कर जब जालंधर चले गये, लोगों के दिलों में एक खालीपन-सा छा गया. सब उनकी आवाज़, उनके नये गाने सुनने को तरस रहे  थे. रसिकों की लाख कोशिश के बाद भी वे मुंबई लौट आये, ना ही उन्हों ने कोई नया गाना रेकोर्ड किया. फिल्मों की दुनिया में गायक-अभिनेता का शून्यावकाश-सा छा गया. देश के हर कोने में उन के आवाज की नकल करने वाले गायकों में सायगल साहब का स्थान लेने की स्पर्धा शुरू हो गयी. भारत के कई उभरते गायकोंने सायगल साहब के स्वर, लय, शब्द और आवाज की गहराई की नकल करना शुरू किया. उनमें से दो युवक कुछ हद तक सफल भी हुवे. एक थे हैदराबाद सिंध के आतमचंद हशमतराय चैनानी और दूसरे, दिल्ली के एक साधारण से मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार के मुकेश चंद माथुर. 

देश की आजादी के कुछ ही वर्ष पहले कि बात है. आतम चंद - जो बाद में सी. एच आत्मा के नाम से जाने गये,  ऊन के करांची, हैदराबाद और लाहोर में कार्यक्रम होते रहे, तो मुकेश चंद सहगल साहब के गाये हुवे गाने  दिल्ली में पेश करने लगेदिल्ली के लोगोंने उन्हें बहुत पसंद किया और कई जगह  गाने पेश करने के निमंत्रण मिलने लगेऊन दिनों फिल्म जगत में मोतीलाल सुपरस्टार हुवा करते थे. वे मूल रूप से दिल्ली निवासी थे. माथुर परिवार उनका दूर का रिश्तेदार था.  जब मोतीलाल की बहन की शादी दिल्ली में मनायी गयी, उन्हों ने मुकेश चंद को गाने पर निमंत्रीत किया. मुकेशने सायगल साहब के कुछ गाने गाये जो मोतीलाल को बहुत पसंद आए. बहन की शादी के बाद वे मुकेश चंद को मुंबई ले गए और अपने घर में रहने के लिए जगह भी दी. उन के लिये संगीत का प्रशिक्षण देने का प्रबंध भी किया. जब मोतीलाल की नई फिल्म 'पहेली नज़र' का निर्माण शुरू हुआ, ऊन्होंने निर्माता से कह कर मुकेश से एक गाना गवाया. फिल्म रिलीज होते ही भारतीय फिल्म उद्योग में तहलका मच गया. "सायगल साहब ने नया गाना पेश किया." फिल्म निर्माता को 'पहेली नजर' से जितनी आय हुवी, उस से ज्यादा मुकेश की उस रेकॉर्ड से हुवी, ऐसा माना जाता है.  लोगों को जब पता चला कि यह गाना सायगल साहबने नहीं, कोई मुकेश नाम के किसी नवोदित गायक ने गाया है, वे हैरान हो गये. गीत था :

दिल जलता है तो जलने दे

ईस गाने का संगीत फिल्म संगीतके भिष्म पितामह माने गये अनिल बिश्वासने रचा था.  फिल्म निर्देशकने उन्हें हिदायत दि थी की ईसे सुनने वालों को ऐसा ही लगे कि ईसे सायगल साहब ने गाया है. अनिलजीने बडी जहेमत से मुकेश को समजाया - सिखाया कि ईस गाने में कहं कहां शब्दों का उच्चार ठेठ लखनवी अंदाज की उर्दु होनी चाहिए जिस में सायगल साहब माहिर थे. किन शब्दों में सायगल कि तरह nasal accent आना चाहिए और तान लेने की अदा भी उन जैसी करवायी. परिणाम यह हुवा कि  ईस गाने के हर मोड पर, हर throw पर सायगल साहब की शैली सुनाई पडती है. 

फिल्म उद्योग में मुकेश का नाम छा गया., और उन्हें ढेर सारी फिल्मों मे गाने प्ले बॅक गाने का काम मिल गया. शुरू शुरू में उन्होंने सायगल साहब की शैली से ही गाया और सारे गाने सफल हुवेनमूने के तौर पर फिल्म 'बावरे नैन' का गाना, जिस का निर्देशन रोशन ने किया था.  

तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं

विश्व का एक अलिखित सत्य है. नकली चीजें ज्यादा समय टिकतीं नहीं, चाहे चांदी की जगह 'जर्मन सिल्वर' हो या देसी घी की जगह डालडा. मुकेशने सायगल साहब की आवाज़ की पूरी नकल करते हुवे गाने गा कर सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया.  कहा जाता है शायद अनिल बिश्वासने ही उनसे कहा, “मुकेश, अपनी आवाज को सायगल साहब की परछायी मत बनाओ. तुम्हारी खुद की गहरी आवाज दमदार है जिस में तुम्हारा दिल, दिमाग और व्यक्तित्व समाया है. तुम ऊसे सायगल साहब की आवाज का कैदी मत होने दो. ऐसा ही करते रहे तो तुम्हें उसकी ईतनी आदत हो जाएगी,  तुम उस बंदीशाला से बाहर नहीं निकल पाओगे. लोग तुम्हें सायगल की आवाजनाम से पहेचानेंगे. तुम्हें कुदरतने ऐसी खुबसुरत आवाज बख्शी है, उसे मुक्त करो वर्ना सी. एच. आत्माकी तरह तुम्हारी प्रतिभा चंद गानों तक सीमित रह जाएगी." बात सच है. सी. एच. आत्मा को आज कल सिर्फ दो गानों से पहचानते हैं - गैर फिल्मी गीत 'प्रितम आ न मिलो' तथा फिल्म नगिना का 'रोऊं मैं सागर के किनारे'.

मुकेश ने उनकी बात मानी. उन्होंने दिल खोल कर अपनी गायकी को खूले दिल से गाना शुरू किया और फिल्म संगीत के विश्व में अपनी अलग पहचान बनाई. सहगल साहब सिने संगीत के ध्रुव तारक थे. मुकेश उन के ईर्द गिर्द घूमने वाले सप्तर्षियोंमें से एक न रहे और स्वतंत्र शुक्र तारा बने और चमकते रहे

गजल की गायकी में भी मुकेश का अंदाज कुछ अलग ही रहा. वहां भी वे सायगल साहबकी परछायीं न रहे और वहां अपना अलग स्थान बना लिया. उदाहरण के तौर पर सायगल साहबकी गजल सुनिये और साथ ही पेश की हुवी मुकेश की गायी हुवी गजल सुनिये. दोनों में गायकों की अपनी अपनी प्रतिभा विशेष रूप से दिखायी देती है. 

दुनिया हुं मैं दुनिया का तलबगार नहीं हुं  

अब पेश है मुकेश की गायी यह गजल : 

तेरे लबों के मुकाबिल गुलाब क्या होगा

बस, मुकेश की यही विशेषता लोगों को भा गयी. राज कपुर कीआहफिल्म, जिस में उन की आवाज में सायगल साहब के आवाज की नकल दिख रही थी, उस का स्वरूप राज कपुर की हीअंदाजमें एकदम बदल-सा गया. वहां मुकेश अपनी स्वतंत्र, मुक्त और मंत्रमुग्ध करने वाली आवाज में सुनाई पडते हैं, जैसे की :

तु कहे अगर…’ 

मुकेश के जीवन में भी ज्वार भाटे आये. उन के कठिन दिनो में उन पर चढा हुवा विशाल कर्ज का बोज उतारने के लिए ऊन्हें जितने मिले, सारे गाने गायें. कुछ दिल लगा कर, तो कुछ बिना संजीदगी से, सिर्फ पैसे कमाने की ईच्छा से. ईस अंतिम श्रेणी में आते हैंडम डम डिगा डिगा’, ‘छलिया मेरा नाम…’ जैसे गीत

संगीत चाहकों कि राय में, मुकेश का लगाव लोक संगीत पर आधारित गाने पर विशेष था. ईन में सब से उत्कृष्ठ गाने रहे हैं तो वे थे फिल्म ‘'तिसरी कसम' के गाने, जिस में उन्हों ने अपनी कलात्मकता की पराकाष्ठा दिखाई, ईस फिल्म में उन के गाये हुवे अविस्मरणीय गीतों की श्रृंखला श्रोताओं के दिलों को झकझोर देती है,  ईस फिल्म में गाया हुवा

सजनवा बैरी हो गये हमार..''

मुकेश की कारकिर्दगी का परमोच्च बिंदु बन गया. ऐसा लगता है जैसे कोई अन्य गायक इस गाने को ऐसी संवेदनशिलता के साथ गा नहीं सकता था. ईसी फिल्म का एक और गाना है. जिस दृश्य पर वह फिल्माया गया है, ऊस में राज कपुर की अदाकारी, मुकेश की हृदय को छू लेने वाली गान शैली और दृश्य।की पार्श्वभूमि -  सब कुछ ईतना अद्भूत, क्षति विहीन है, श्रोता - दर्शक के मुख से एक ही शब्द निकलेगा - वाह!

दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समायी…'


ऐसे ही लोकसंगीत पर आधारित उन के दो गानें हृदयस्पर्शी रहे. शशि कपूर - नंदा अभिनित एक पुरानी फिल्म 'चार दिवारी' में मुकेशने गंगा नदी पर नाव चलाने वाले मछुआरे का भजन गाया है. ईस दृश्यमें आप देखिएगा  ईस भजन के दो अलग-अलग interpretations. एक है मछुआरे का आत्म निवेदन - हे परमात्मा, मेरे प्रितम, मैं तो एक अनपढ गँवार गुणविहिन ईन्सान हुं. मुख पर आपको कैसे प्रसन्न कर सकता हुं? दुसरी और ईक नवोढा - नववधू, शादी की पहेली रात्रि में शयन कक्ष में प्रथम बार एकांत में बिस्तर पर बैठी पति की प्रतिक्षा कर रही है. मन अशांत है. मन में चिंता है, 'मैं मेरे पति को कैसे रिझा सकूंगी? मुझ में कोई ऐसे गुण नहीं है, जिस से मैं उन्हें मना सकुं.."  मुकेशने ईस भजन को ऊन्हीं भावनाओं को उजागर करते हुवे यह लोकगीत गाया है. क्या लयबद्ध मुरकी, भावपूर्ण तान! गीत लिखा है शैलेन्द्रजी ने और संगीतबद्ध किया है वैसे ही मेधावि संगीतकार सलील चौधरीजी ने, कम से कम वाद्यसमूह के साथ, किंतु श्रोता के हृदयके तारों को हिला कर साथ जोडती हुवी शैली से!

कैसे मनाऊ पियवा, गुन मेरे एकहु नाही


अंग्रेजी में एक मुहावरा है - All good things come to an end. जब मुकेश अपनी कला के सर्वोच्च बिंदु पर थे, अमरिका के डेट्रोईट शहर में पेश हो रहे कार्यक्रम में उन पर दिल का दौरा पडा और वहीं वे चल बसे

जगत से बिदायी लिये आज पचास साल बित गये, लेकिन मुकेश की आवाज अभी भी कानों मे गुँजती है. दिलों को छू लेती है और मूंह से शब्द निकलते हैं,  क्या वे दिन थे, और अब

जाने कहाँ गए वो दिन 

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