आवाज की दुनिया के दोस्तों (शेष)
मनुष्य के जीवन में समय कैसे कैसे परिवर्तन ला देता है !
सायगल साहब के जीवनमें भी आमुलाग्र बदलाव आया.
एक दिन न्यू थिएटर्स के स्टूडियो में आग लगी. स्टुडियो पूरी तरह जल कर खाक हो गया. फिल्मों का निर्माण बंद हो गया. सायगल साहब कोलकाता छोड़कर मुंबई चले गये. वहां उन्हें एक के बाद एक कई फिल्में मिलती गयीं. पता नहीं क्यों और कैसे, चाहे काम का दबाव हो या कोई अन्य कारण, उन्हें शराब की लत लग गयी. यह इस हद तक बढ़ गई थी कि जब तक वह स्कॉच व्हिस्की का 'शॉट' न ले लें, वे गा नहीं पाते थे. हालाँकि, उनके गाए 'तानसेन', 'सूरदास', 'मेरी बहन', 'शाहजहाँ' के गीत और फिल्में बेहद लोकप्रिय रही.
सायगल साहब के गायन की ख़ूबसूरती यह थी कि गीत हो या गझल, हर शब्द में जहाँ जिस प्रकार का भाव, जहां तलफ्फूज कि नजाकत चाहिये, बडी खुबी और सरलता के साथ पेश करते थे, गीत की हर पंक्ति, हर लफ्ज श्रोताके दिल छू लेता था. कभी कभार नशे की हालत में भी कोई गाना पेश किया, उन के सूर और लय की शुद्धता में रत्तिभर का फर्क न पडा. पूरा शुद्ध २४ कैरेट सोने की तरह वह नग्मा होता था. उन की गायी हुवी ईस गजल सुनिये. शब्द, उच्चार, सूर, लय, ताल, भाव और शायर की और उन का भक्ति भाव या समर्पण - ईन सब का समन्वय नमूने के तौर पर पेश की हुवी गजल में महसूस होगी!
दुनिया में हुं दुनिया का तलबगार नहीं हुं
पिछली सदी में दूरदर्शन के कार्यक्रमों में सुप्रसिद्ध फिल्मी हस्तियाँ बुलायी जाती थीं. ऐसे ही एक मौके पर संगीतकार नौशाद आये थे. जब सायगल साहब का जिक्र हुवा, उन्होंने एक प्रसंग के बारे में बात कही, जो सच ही आश्चर्यकारक थी.
1946 के वर्ष नौशाद फिल्म ‘शाहजहां' के लिए संगीत तैयार कर रहे थे. उस वक्त उन्हें सायगल साहब के गानों के कई 'टेक' लेने पड़ते थे. न जाने क्या बात थी, गाना ‘जमता’ ही नहीं. जब तक वे खुद अपने ही गाये हुवे गाने पर स्वीकृति की मोहर नहीं लगाते, गाना रिकार्ड नहीं होने देते. ऐसी हालत में वे अपने ड्राइवर से कहते, “जोसेफ, गाडी में से 'काली-पाँच' ले के आना तो !" उनके गाने का सूर हार्मोनियम की काली पांचवी पट्टी हुवा करता था. ईसी पर वे सूर पकड सकते थे, और अब हालात यह हुवे थे की सही सूर लगाने के लिये शराब का सहारा लेना पड रहा था.
एक दिन नौशाद मियां ने सायगल साहब को उनकी बोतल वाली 'काली पांच' के बगैर एक गाना गाने का अनुरोध किया. गाना था -
अय कातिबए तकदीर मुझे ईतना बता दे
दो या तिन बार गाने के बाद उन्होंने कहा, "नौशाद मियां, माफ करना, काली पाँचके बगैर हम गा नहीं सकते." कह कर उन्होंने बोतलवाली ‘काली पाँच’ मंगवाई, और दो या तिन राउंड के बाद गाना शुरू किया.
अगले दिन जब वे स्टुडियो में आये, नौशादने उन को रिकॉर्डिंग सुनाई. सायगल साहबने प्रसन्न होकर कहा, "देखा? काली पाँच के बिना कोई सूर लगता ही नहीं."
जब नौशादने उनसे कहा, 'सर, यह रिकार्डिंग आपकी ‘काली पाँच’ के बिना आपका गाये हुवे गाने का है. आपकी असली 'काली पाँच' शुद्ध, तपते सोने के समान है. शराब की काली पाँच कभी भी आपको कुदरत के बक्षे हुवे सूर के सामने खरी नहीं उतरेगी.”
यह सून कर सायगल साहबने उदास हो कर कहा, "भाई नौशाद, काश तुम्हारे जैसे किसी दोस्त ने यह बात कुछ साल पहले बतायी होती ! शायद हम दो-चार साल और जी लेते.”
फिर भी ईस ‘काली पाँच’ की असर तले ही उन के गाये हुवे सूरदास के भजन और तानसेन, शाहजहाँ जैसी फिल्मों के गीत अमर हो गये. जब मैं लंदनमें भारतीय मूल के मनोऋग्ण मरिजोंके Rehabilitation Centre में कार्यरत था, उपचार कार्यक्रममें संगीत का कार्यक्रम चलाते थे. एक दिन अचानक एक ईस्माईली महिलाने कहा, वे उन्होंने बचपनमें सूना हुवा उन का प्रिय गीत गाना चाहती हैं. जब उन्होंने गाना शुरू किया, मैं भौंचक्का रह गया. वह सायगल साहब गाया हुवा 'भक्त सूरदास' का भजन था! उस भजन का माधुर्य, और जिस अंदाज में सायगल साहबने गाया था, ए मुस्लिम लडकी के जहेन को ईतना भा गया, सालों बाद वे पूरा भजन गा सकीं! शब्द थे..
सायगल साहब की ईन यादगार फिल्मों के बाद उनकी सेहत बहुत ही खराब हो गई. शराब का अतिरेक होने से उन्हें लिवर सिरोसिस की बिमारी लग गयी. जीवन के आखिरी दिन वतन में ही कटे, ईस आशय से उन्होंने मुंबई छोड़ने का फैसला किया और वे जालंधर चले गये.
भारतीय फिल्मों में सायगल साहब के गाये हुवे गाने नायाब रत्न समान है. लेकिन उनकी गायी हुवी लोरी – “सो जा, राजकुमारी” कोहिनूर की तरह चमकती हुवी, अविस्मरणीय कलाकृति बन गयी. मुंबई छोडने के कुछ ही महिनों बाद खुद सहगल साहब गहरी नींद में सो गये. तारीख थी 18 जनवरी 1947. पता नहीं, किसीने उन्हें उस वक्त यह रिकार्ड सुनायी या नहीं.
सायगल साहब की अमर कहानी का समापन करते हुवे उन की फिल्म ‘दुश्मन’ का एक दृश्य प्रसतूत है. शायद सायगल साहब जब आखिरी बार मुंबई छोड कर लंबी छूट्टी पर जाते समय अपने श्रोताओं को गाना पेश करने से पहले अंतिम शब्द कहते हैं..
"आवाज़ की दुनिया के दोस्तों.."
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